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भिक्खु संघ के सेवा का, संघदान का पुण्य बहुत बड़ा अमर्यादीत, अप्रमेय (unlimited, uncountable) होता है ।

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प्रतिकार

श्रद्धावान गृहस्थोंको चाहिए की, वे जब जब संभव हो, यथासंभव भिक्खु-भिक्खुणी संघ को दान देते रहें, सेवा करते रहें ।

परंतु भिक्खु-भिक्खुणी संघ को दान देते समय, सेवा करते समय कभी यह नहीं सोचे कि, हम भिक्खु-भिक्खुणी संघ की मदद कर रहे हैं, या भिक्खु-भिक्खुणी संघ पर उपकार कर रहे हैं । अगर कोई ऐसा सोचता है, तो उस दान का महान पुण्य से वह वंचित रह जाता है ।

भिक्खु-भिक्खुणी संघ को दान देने का, सेवा करने का उद्देश्य यह होना चाहिए कि,

1. मुझे असीम पुण्य अर्जित करना है ।
2.अपनी पारमिता पुष्ट करना है ।
3.तथागत सम्यक संबुद्ध के संघ
की सेवा ।
4. धम्म-चक्र गतिमान रहें ।
5. बुद्ध धम्म और संघ के प्रति मेरी श्रद्धा
दिनोंदिन बढ़ती रहें ।
6. मेरे परिजन, रिश्तेदार, मित्र व अन्य
परिचित भी महान पुण्य के भागीदार बनें ।
7. मेरे परिजन, रिश्तेदार, मित्र व अन्य
परिचित भी बुद्ध धम्म और संघ के प्रति श्रद्धावान बनें ।
8. इस दान के कारण मुझे निर्वाण प्राप्त
हो । यह महान पुण्य निर्वाण प्राप्ति में मुझे सहायक हो ।
9. इस पुण्य कर्म के कारण निर्वाण प्राप्ति
तक कभी भी, किसी भी जन्म में मुर्खों
से मेरी संगति न हो, निर्वाण प्राप्ति तक
हर जन्म में संत सज्जनों की ही संगति होती रहें ।
10. मेरी कभी दुर्गति न हो, सदा सद्गती ही होती रहें असीम मंगल मैत्री सहित ।

बातम्या आणि जाहिरातकरीता संपर्क साधावा - 7038636121

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